सवाल यह है कि आधार के पीछे मोदी सरकार इतनी पागल क्यों है? अभी कुछ दिनों पहले एक खबर देखी जो बड़े बड़े मीडिया चैनलों की सुर्खियों में जगह ना पा सकी। खबर थी कि झारखंड, मणिपुर और आंध्र प्रदेश के स्कूलों के लगभग साढ़े चार लाख फर्जी छात्रों का पता चला है जिसके लिए सरकार मिडे डे मील के तहत पैसे भेज करती थी । और यह संभव हुआ है आधार कार्ड से।
एचआरडी मंत्रालय के सामने आईं तीन राज्यों द्वारा साल 2015 -16 और 2016 -2017 के आंकडों से पता चला है कि कई ऐसे स्कूल है जो की मिड डे मील स्कीम के तहत फंड पाने के लिए बच्चों के फर्जी नाम स्कूल के रजिस्टर में जोड़ हुए थे। जैसे , आंध्र प्रदेश में 29 लाख सरकारी स्कूल के बच्चों के नाम आधार कार्ड से जोड़े गए थे लेकिन बाद में पता चला कि स्कूलों में 2.1 लाख बच्चे सिर्फ कागजी तौर पर ही अस्तित्व में बने हुए थे।
आधार की बदौलत इस घोटाले की व्यापकता का अंदाजा, मंत्रालय के अधिकारियों के बयान से होती है कि अभी सभी राज्यों के आकड़े आने बाकी हैं। तभी पता चलेगा कि स्कूलों में पढ़ने वाले फर्जी छात्रों की संख्या कितनी हैं। यह तो महज एक बानगी है। ऐसे घोटाले स्वास्थ्य और अन्य क्षेत्रों में भी जरूर होंगे, इसमें कोई शक नहीं।
आधार को गैस सब्सिडी से जोड़ा गया है। आधार को स्वास्थ्य सेवाओं से भी जोड़ा गया है। आधार को मोबाईल नंबर से जोड़ने की बात हो रही है। आधार को पैन नंबर से जोड़ने की बात हो रही है। आधार को हज यात्राओं से भी जोड़ने की बात है। आधार को ड्राइविंग लाइसेंस से भी जोड़ा जाएगा। सरकार आधार को देश की हर उस व्यवस्था से जोड़ देना चाहती है जिसमें नागरिक हित जुड़े हों।
हालांकि आधार को लेकर शिकायतें भी बहुत हैं। सबसे बड़ा डर तो प्राइवेसी से जुड़ा है। जिस तरह देश में लचर सायबर सुरक्षा और इससे जुड़े कानूनों की हालात है, आधार उपभोक्ताओं के लिए उनकी निजता का मुद्दा सर्वोपरि रहेगा। इसे देखते हुए आज ही सुप्रीम कोर्ट ने कि समाज कल्याण योजनाओं के तहत लाभ उठाने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं हैं। सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगदीश खेहर सिंह, न्यायमूर्ति डी.वाय. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की सदस्यता वाली पीठ ने यह फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जेएस खेहर सिंह ने कहा कि आधार जनहित स्कीम के लिए अनिवार्य नहीं है। लेकिन गैर-लाभकारी योजनाओं (जैसे बैंक खातों के खोलने या टैक्स रिटर्न करने से जोड़ने) के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट अपने ही दिए गए फैसलों की समय समय पर समीक्षा करते रहता है। ऐसे में केन्द्र सरकार कोई हार नहीं मानने वाली । आधार का विस्तार जितना अभी हुआ है, उसी से इतने फायदे सामने आने लगे हैं कि सरकारों को धीरे धीरे यह बहुपयोगी लगने लगेगा। यह भी संभव हैं कि प्राईवेसी के लिए तमाम उपाय किए जाएं। तब शायद सुप्रीम कोर्ट को भी भी शिकायत नहीं रहेगी।
