जल्लीकटटू के जलते सवाल

ऐसा कभी कभार ही होता है। जनभावना का सम्‍मान करते हुए केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद जल्‍लीकट्टू से संबंधित अध्‍यादेश को राज्‍यपाल विद्यासागर राव ने आज मंजूरी दे दी। उच्चतम न्यायालय ने सांडों को काबू करने के इस खेल पर प्रतिबंध लगाया हुआ था। तमिलनाडु सरकार ने जल्लीकटटू के आयोजन के लिए अध्यादेश जारी करने का प्रस्ताव रखा था। चूंकि यह विषय संविधान की समवर्ती सूची में आता है, ऐसे में तमिलनाडु के लिए केंद्र से मंजूरी लेना अनिवार्य था।

केंद्र ने जल्लीकट्टू के आयोजन का रास्ता साफ करते हुए एक अध्यादेश को पहले ही मंजूरी दे दी थी। केंद्र के तीन मंत्रालयों गृह, कानून एवं पर्यावरण मंत्रालय ने इस अध्यादेश की जांच के बाद इसे हरी झंडी दिखा दी थी। केंद्र द्वारा जल्लीकटटू अध्यादेश को मंजूरी दिये जाने के एक दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया था, ‘तमिलनाडु की समृद्ध संस्कृति पर हमें गर्व है।'


भारत देश विविधताओं का देश है। इस पूरे मामले में जल्लीकट्टू को लेकर पिछले कुछ दिनों से ऐसे पूरे देश में उमंग और भावनाओं से भरे ऐसे ऐसे नजारे देखने को मिले जो अभूतपूर्व थे। इन सबके बीच एक बात तो माननी पड़ेगी कि ऐसी भावनाओं ने विवेकपूर्ण बहस की संभावनाओं का दायरा खत्म कर दिया है। दक्षिण के अधिकांश राजनैतिक दल तो तर्कवादी आंदोलन की आग से पैदा हुए हैं। लेकिन आज द्रविड़ पार्टियों सहित तमाम दल और कई मशहूर शख्सियतें एक ऐसी परंपरा के पक्ष में खड़ी हो गई हैं, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई हुई है। हालांकि इस बारे में अभी सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम फैसला नहीं आया है, लेकिन अंतरिम आदेश देते समय कोर्ट पशु प्रेमियों की इस दलील से सहमत था कि जल्लीकट्टू में सांडों के प्रति क्रूरता बरती जाती है।

हालांकि सदियों से ऐसे खेलों का लोक-जीवन में बेशक महत्व रहा है। लोगों को मनोरंजन के साथ-साथ जोखिम उठाने और अपनी शारीरिक शक्ति के प्रदर्शन का मौका ऐसे आयोजनों में मिलता था। लेकिन जो परंपरा एक समय सर्वस्वीकार्य थी, यह आवश्यक नहीं है कि हमेशा वैसा ही बना रहे। कई बार समाज को बदलना पड़ता है। हम भारतीयों को भी उस पर ध्यान देना होगा। वरना यह हमारी अतीत से चिपकी सोच को ही सामने लाएगा। वैसे भी कोई जीवंत सभ्यता वह होती है, जो अपनी ही परंपराओं की लगातार आलोचनात्मक समीक्षा करती रहती है। समय समय पर हमने ऐसा किया भी है। सती-प्रथा,बाल-विवाह जैसी कुरीतियों को खत्म करने की कोशिश कर के। जल्लीकट्टू को भी हमें इसी नजरिए से देखने की जरुरत है,बिना किसी द्वेष भाव से।